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Buddha Purnima – बुद्ध पूणिमा 2020

बुद्ध पूणिमा बौद्ध धर्म के लोगों का सबसे पवित्र त्योहार हैं। बुद्धपूणिमा को बुद्ध जयंती, वेसाक,वैशाका और बुद्ध जन्मदिन भी कहा जाताहै। बुद्ध जयंती भगवानबुद्ध की याद मे मनाया जाता है। यह वैशाख मे पूणिमा की रात( हिन्दू कैलेंडर के अनुसार जो आमतौर पर अप्रैल या मई मे पडता हैं।) को प्रतिवर्ष मनाया जाता हैं।

क्यों मनाई जाती हैं बुद्ध पूर्णिमा ?

भगवान बुद्ध के जन्म ,बुद्धत्व की प्राप्ति व महापरिनिवाण का दिन।

भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व मे सिद्धार्थ गौतम के रुप मे शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन केघर मे हुआथा। वह एक वास्तविक ऐतिहासिक शाक्य महापुरुष थे। जो शाक्य के राजकुमार थे । सोलह वर्ष की आयु मे , सिद्धार्थ ने यशोधरा नाम की एक रुपवान युवती से विवाह किया। और उनका एक बेटा था । जिसका नाम राहुल था ।उनके जीवन मे एक अद्भभुत मोड़ आया। उन्होंन दुनिया के लोगों को देखा ।उन्होंन ज्ञान की खोज के लिए अपनी पत्नी, बेटे और अपार धन क़ छोड़ दिया था। यह वर्षो तक कई जगहों पर घूमे और पच्चीस वर्ष कि उम्र मे वह बोधगया मे पहुंचे, जहां वह एक पीपलपेड़ के नीचें बैठे थे। और अकेले ध्यान करते थे। बुद्ध जयंती का मुख्य त्यौहारबोधगया मे होता हैं। बौद्ध धर्म के लोगो के लिए,बोध गया गौतम बुद्ध के जीवन से सबंधित सबसे विशेष रूप से प्रिय जगह हैं।

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Budha Purnima Story

गौतम बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार।

भगवान बुद्ध बौद्ध धर्म के गुरु मानें जाते हैं। और उन्हें विष्णु का नौवां अवतार माना जाता हैं। यह बुद्ध पूणिमा का शुभ अवसर था जिसमें की बुद्ध भगवान के जीवन की तीन विशेषरूप से घटनाएं घटी थी, उनका जन्म,ज्ञान और उनकी मृत्यु हुई थी। ऐसा माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और उसी दिन उनका निधन हो गया।

कहाँ कहाँ मनाई जाती हैं बुद्ध जयंती

बुद्ध जयंती पुरे विश्व मे बडी धूमधाम से मनाई जाती हैं, तथा अन्य देशों जैसे थाईलैंड मे विशाखा,बुका ,इंडोनेशिया मे वैशाक और श्री लंका और मलेशिया मे वेसाक कहा जाता हैं। यह बडे़ पैमाने पर भारत ,नेपाल मे मनाई जाती हैं।

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जानिये क्यों खास है यह बुद्ध पूर्णिमा

बौद्ध धर्म के चार परम सत्य।

यह चार परम सत्य बौद्ध धर्म की नींव हैं-

  • सभी मानव को हर एक दुख के लिए पीड़ा होती हैं।
  • पीड़ा कारण होता हैं।
  • वह कारण लालसा या इच्छा होती हैं।
  • पीड़ा के समापन के लिए एक ही रास्ता हैं।

बौद्ध धर्म के आठ पथ

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चौथा नोबल सत्य आठवां पथ हैं, जो जीवन के

सभी पहलुओ को छुते हैं।

  • सही विश्वास
  • सही इरादा
  • सही भाषण
  • सही व्यवहार
  • सही आजीविका
  • सही प्रयास
  • सही अनुष्ठान
  • सही एकाग्रता

बौद्ध धर्म के 6- अवधारणाएँ

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बौद्ध धर्म की अवधारणाएँ निम्न हैं –

  • हत्या नहीं करना।
  • चोरी नहीं करना।
  • लैगिक दुराचार से विरत रहना।
  • झूठ कभी नहीं बोलना।
  • नशे की लत से दूर रहना।

बौद्ध धर्म का मानना हैं कि एक मानव कुल सही दिशा मे आगे तभी बढ़ना शुरु करता हैं, जब वह बुद्ध और उनकी शिक्षाओं और उनके मठों मे विश्वास रखें।

बुद्ध के जीवनी स्रोत

बुद्ध के जीवन के स्रोत कभी-कभी पारंपरिक जीवनियों के साथ संघर्ष करते हैं जिनमें शामिल हैं:

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  1. बुद्धकारिता जो सबसे शुरुआती जीवनी है और पहली शताब्दी ईस्वी में प्रसिद्ध कवि असवघोसा द्वारा लिखी गई एक महाकाव्य कविता भी है।
  2. ललितविस्तार सोत्र, गौतम बुद्ध की अगली सबसे पुरानी जीवनी है, यह तीसरी शताब्दी ई.पू.
  3. महासंघिका लोकोत्ताराव परंपरा से महावास्तु एक और प्रमुख जीवनी है जो संभवतः चौथी शताब्दी ईस्वी सन् में रची गई थी।
  4. बुद्ध की संपूर्ण धर्मगुप्तक जीवनी अभिज्ञानराम सूत्र के हकदार हैं, और कोई भी तीसरी और छठी शताब्दी ईस्वी सन् के बीच इस डेटिंग के कई चीनी अनुवाद पा सकता है।
  5. अंतिम रचना, बुद्धघो द्वारा निधानाथ श्रीलंका में थेरवाद परंपरा से है और 5 वीं शताब्दी तक है।

बुद्ध की मृत्यु

बुद्ध की मृत्यु के संबंध में दो सिद्धांत हैं। पहला यह कि बुद्ध कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो इस शर्त पर दुनिया के अंत तक रह सकता है कि कोई उसे ऐसा करने के लिए आमंत्रित करे। वह कोई है जो अपनी मृत्यु के समय को ठीक कर सकता है। चूंकि आनंद उसे दुनिया की उम्र या उससे भी अधिक समय तक जीने के लिए आमंत्रित करने में विफल रहे, इसलिए बुद्ध ने सांसारिक दायरे को छोड़ दिया।

दूसरी और अधिक व्यावहारिक कहानी कहती है कि बुद्ध उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य में असफल हो रहे थे। वैशाली में अपने आखिरी रिट्रीट के दौरान एक गंभीर दर्द के कारण उसकी जान जा सकती थी। ऐसा कहा जाता है कि बुद्ध अपनी अप्रत्याशित बीमारी और मृत्यु के बाद अपने उदार मेजबान (कुंडा द ब्लैकस्मेयर) द्वारा पेश किए गए एक विशेष व्यंजन के सेवन के बाद आए। हालांकि, बुद्ध ने अपने परिचारक आनंद को कुंडा को समझाने के लिए निर्देश दिया कि उनके स्थान पर खाया गया भोजन बीमारी से कोई लेना-देना नहीं है और यह योग्यता का एक स्रोत है क्योंकि इसने बुद्ध के लिए अंतिम भोजन प्रदान किया था। विद्वानों, मेट्टानांडो और वॉन हिनुबर का सुझाव है कि बुद्ध भोजन की विषाक्तता के बजाय वृद्धावस्था के एक लक्षण, मेसेंटेरिक रोधगलन से मर गए। बुद्ध की मृत्यु पूर्णिमा की रात विशाखापत्तनम के चंद्र महीने में हुई (जो मई या जून में आती है)। उनकी जयंती को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है। उनके अंतिम शब्दों के बारे में बताया गया है: “सभी मिश्रित चीजें (साखरा) खराब होती हैं। परिश्रम के साथ अपनी मुक्ति के लिए प्रयास करें। “

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