vaibhav lakshmi brat

Sukh,Shanti,Vaibhav
(वैभव),aur Lakshmi(लक्ष्मी) prapti ke liye adbhut chamatkari prachin vrt

Vaibhavlakshi(वैभवलक्ष्मी )vrt krne ki vidhi

यह ब्रत सौभाग्यशाली स्त्रियां करें तो उनका अति उत्तम फल मिलता है। लेकिन घर में यदि सौभाग्यशाली स्त्रियां न हो तो कोई स्त्री एवं कुमारिका भी यह व्रत कर सकती है।

स्त्री के बदले पुरुष भी यह व्रत करें तो उसे भी उत्तम फल अवश्य मिलता है।

यह व्रत पूरी श्रद्धा और पवित्र भाव से करना चाहिए। खिन्न होकर या बिना भाव से यह व्रत नहीं करना चाहिए।

यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। व्रत शुरू करते वक्त 11 या 21 शुक्रवार की मन्नत रखनी पड़ती है और पुस्तक में लिखी शास्त्रीय विधि अनुसार ही व्रत करना चाहिए। मन्नत के शुक्रवार पूरा होने पर विधि पूर्वक और इस पुस्तक में दिखाई गयी शास्त्रीय रीती अनुसार उध्यापन विधि करनी चाहिए यह विधि सरल है किन्तु शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत न करने पर व्रत का जरा भी फल नहीं मिलता  है।

एक बार व्रत पूरा करने के बाद फिर मन्नत कर सकते है और फिर से व्रत कर सकते है।

माता लक्ष्मी देवी के अनेक स्वरूप हैं। उनमे उनका धनलक्ष्मी स्वरूप ही वैभवलक्ष्मी है और माता लक्ष्मी को श्रीयंत्र अति प्रिय है। व्रत करते वक्त पुस्तक में दिए हुए माँ लक्ष्मी जी के हर स्वरूप को और श्रीयंत्र को प्रणाम करना चाहिए तभी व्रत का फल मिलता है। अगर हम इतनी भी मेहनत नहीं कर सकते है तो लक्ष्मी देवी भी हमारे लिए कुछ करने को तैयार नहीं होंगी। और हम पर माँ की कृपा नहीं होगी।

व्रत के दिन सुबह से ही “जय माँ लक्ष्मी ” , “जय माँ लक्ष्मी “का रटन मन ही मन करना चाहिए और माँ का पुरे भाव से स्मरण करना चाहिए।

शुक्रवार के दिन यदि आप प्रवास या यात्रा पर गए हो तो वह शुक्रवार छोड़कर  उसके बाद के शुक्रवार को व्रत करना चाहिए। पर व्रत अपने ही घर में करना चाहिए सब मिलाकर जितने शुक्रवार की मन्नत ली हो,उतने शुक्रवार पुरे करने चाहिए।

घर में सोना न हो तो चंडी की कोई भी चाँदी की चीज़ पूजा में रखनी चाहिए। अगर वह भी न हो तो रोकड़ रुपया रखना चाहिए।

व्रत पूरा होने पर कम से कम सात स्त्रियों को या आपकी इच्छानुसार जैसे -11 ,21,41,101 स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की पुस्तक कुमकुम का तिलक करके भेंट के रूप में देना चाहिए। जितनी ज्यादा पुस्तक आप देंगे उतनी माँ लक्ष्मी की कृपा होगी। और माँ लक्ष्मी की यह अद्द्भूत व्रत का ज्यादा प्रचार होगा।

व्रत के शुक्रवार को स्त्री रजस्वला हो या सुतकी हो तो वह शुक्रवार छोड़ देना चाहिए और बाद के शुक्रवार से व्रत शुरू करना चाहिए। पर जितने शुक्रवार की मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार  पुरे करने चाहिए।

व्रत की विधि शुरू करते वक्त “लक्ष्मी स्तवन”का एक बार पाठ करना चाहिए।

व्रत के दिन हो सके तो उपवास करना चाहिए और शाम को व्रत की विधि करके माँ का प्रसाद लेकर शुक्रवार करना चाहिए। अगर न हो सके तो फलाहार या एक बार भोजन करके शुक्रवार करना चाहिए। अगर ब्रतधारी का शरीर बहुत कमजोर हो तो दो बार भोजन ले सकते है। सबसे महत्व की बात यह है कि व्रतधारी माँ लक्ष्मीजी पर पूरी पूरी श्रद्धा और भावना रखें और मेरी मनोकामना माँ पूरी करेंगी ही ,ऐसा ढृढ़ संकल्प करें।

Vaibhavlakshmi (वैभवलक्ष्मी)व्रत की कथा

एक बड़ा शहर था। इस शहर में लाखों लोग रहते थे। पहले के ज़माने के लोग साथ साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते थे। नए ज़माने के लोगो का स्वरुप ही अलग सा है। सब अपने अपने काम के व्यस्त रहते है किसी को किसी की परवाह नहीं घर के सदस्यों को भी एक दूसरे की परवाह नहीं होती। भजन-कीर्तन ,दया -माया ,भक्ति -भाव परोपकार जैसे संस्कार काम हो गए है शहर में बुराईयां बढ़ गयी थी। शराब, जुआ ,रेस चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे।

कहावत है कि -हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुयी है ऐसी तरह इतनी साड़ी बुराईयो के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उनके पति को गृहस्थी मानी जाती थी।शिला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी थी। उनका पति भी विवेक और सुशील था। शिला और उनका पति ईमानदारी से जीते थे। वे किसी की बुराई करते न थे। और भगवन के भजन में अच्छी तरह समय ब्यतीत कर रहे थे। उनकी गृहस्थी आदर्श गृहस्थी थी और शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे। शीला की गृहस्थी इसी तरह ख़ुशी -ख़ुशी चल रही थी। पर कहा जाता है कि “कर्म की गति अकल है ”  विधाता के लिखे कोई नहीं समझ सकता है। इन्सान का नसीब पल भर में राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। शिला के पति  के अगले जन्म के कर्म भोगने बाकि रह गए होंगे कि वह बुरे लोगो से  बैठा। वह जल्द से जल्द करोड़पति बनाने का सपने देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चला गया वह करोड़पति के बदले रोड पर आ गया अथार्त भिखारी जैसी हालत हो गयी। शहर में शराब, जुआ, रेस, गांजा फैली हुयी थी। उसमे शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी गलत आदत लग गयी। इस तरह बचाई हुई धनराशि ,पत्नी के गहने।,सब कुछ जुए शराब में गवा दिया। ऐसी तरह एक वक्त येसा भी था कि वह पत्नी के साथ बहुत ख़ुश और प्रभु के भजन में सुख -शांति से वक्त ब्यतीत करता था। उसके वजाय घर में भुखमरी और दरिद्रता फ़ैल गयी।

शिला सुशील और संस्कारी स्त्री थी। शिला को अपने पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ। किन्तु वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल रख कर दुःख सहने लगी। कहा जाता है की सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख आता ही है। इसलिए दुःख के पीछे सुख आएगा ही ऐसे श्रद्धा के साथ शिला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी। इस तरह शीला असहाय दुःख सहते सहते प्रभु भक्ति में वक्त बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला सोच में पड़ गयी कि मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा। फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि का आदर करना चाहिए ,फिर उसने द्वार खोला और देखा की एक माँझी खड़ी थी। वह बड़ी उससे  उम्र की लगाती थी। लेकिन उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखार रहा था। उनके आँखों में से मानो अमृत बह रहा है। उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार में छलकता था। उनको देखते ही शिला के मन में अपार शांति छ गयी वैसे शिला इस मांझी को पहचानती नहीं थी। फिर भी उनको देखकर शिला के रोम रोम में आंनद छा गया। शिला मांझी को आनद के साथ घर ले आयी। घर में बैठाने के लिए कुछ नहीं था। अतः शिला ने सकुचा क्र एक फटी हुयी चादर पर उनको बिठाया।

माझी ने कहा -क्यों शिला ! मुझे पहचाना नहीं ?शिला ने सकुचा कर कहा -माँ आप को देखते ही बहुत ख़ुशी हो रही है। बहित शांति हो रही है। ऐसा लगता है कि बहुत दिनों से जिसे ढूंढ रही थी वे आप ही है। पर मई आप को पहचान नहीं सकती।

माँ जी ने हँसते हुए कहा -क्यों तुम मुझे भूल गयी ?हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी  के मन्दिर में भजन – कीर्तन  होते है ,तब मै भी वही आती  हूँ। हम हर शुक्रवार को तो  मिलते है। पति के गलत रास्ते पर चले जाने से शिला हमेशा दुःखी रहने लगी थी। और दुःख के मरे लक्ष्मी जी  मंदिर में भी नहीं जाती थी। बाहर के लोगो से नज़र मिलाने से भी सरमाती थी। उसने यादास्त पर जोर दिया पर यह माँ जी याद नहीं आ रही थी।

तभी माँ जी ने कहा -शिला तुम लक्ष्मी जी के मंदिर में बहुत मधुर गीत गाती थी। अभी-अभी तू दिखाई नहीं देती थी। इसलिए मई सोची की तुम क्यों नहीं आती है ?कही तुम बीमार तो नहीं हो गयी हो न ? ऐसा सोच के मै तुझे देखने चली आयी हूँ।

मां जी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों में आंसू आ गये। माँ जी के सामने शिला विलक विलक कर रोने लगी। यह देख माँ जी शिला के नजदीक गयी और उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेर कर सांत्वनां देने लगी। माँ जी ने कहा -बेटी! सुख और दुःख तो धुप और छाँव जैसा होता है। सुख के पीछे दुःख आता है और दुःख के पीछे सुख आता है। धैर्य रखो बेटी !और तुझे क्या परेशानी है ?अपने दुःख की बात मुझे सुना। तुम्हारा मन हल्का हो जायेगा और तुम्हारे दुःख का भी कोई उपाय मिल जायेगा।

माँ जी की बात सुनकर शिला के मन को शान्ति मिली। उसने माँ जी से कहा माँ गृहस्थी में भरपूर सुख और खुशियां थीं। मेरे पति भी सुशिल थे। भगवान की कृपा से पैसे की बात में भी हमे संतोष था। हम शांति से अपना गृहस्थी चलते ईस्वर भक्ति में अपना वक्त ब्यतीत करते थे। अचानक हमारा भाग्य हमसे रूठ गया। मेरे पति की बुरे लोगो से दोस्ती हो गयी ,जिसके वजह से मेरे पति शराब ,जुआ ,रेस ,चरस – इत्यादि गलत आदतों की लत लग गयी है। उन्होंने सब कुछ गवाँ दिया।और हम रास्ते के भिखारी बन गए।

यह सुनकर माँ जी ने कहा -सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख आता ही रहता है। आएसा भी कहा जाता है कि “कर्म की गति न्यारी होती  है। “हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते है। इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगद चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आयेंगे। तुम तो माँ लक्ष्मी जी की भक्त है। माँ लक्ष्मी तो प्रेम और करुणा के अवतार हैं। वे  अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती है। इसलिए तू धैर्य रख की “माँ लक्ष्मी जी का व्रत ” कर इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा।

माँ लक्ष्मी जी का व्रत करने की बात सुनकर शिला के चहरे पर चमक आ गयी। तब शिला ने पूछा- माँ लक्ष्मी की व्रत कैसे की जाती है। आप मुझे समझाइये ! मई यह व्रत अवश्य करूंगी।

माँ जी ने शिला से कहा-माँ लक्ष्मी का व्रत बहुत सरल है। इस व्रत को “वरदलक्ष्मी  व्रत ” या “वैभवलक्ष्मी  व्रत ” कहा जाता है। यह व्रत यस प्राप्त करता है। ऐसा कहकर माँ जी “वैभवलक्ष्मी व्रत ” की विधि बताने लगी।

बेटी वैभवलक्ष्मी व्रत बहुत ही सीधा साधा व्रत है। किन्तु यह व्रत बहुत लोग गलत तरिके से करते है। अतः उसका फल नहीं मिलता। कई लोग कहते है कि सोने के गहने को हल्दी और कुमकुम से पूजा करो। बस हो गया। पर ऐसा नहीं है। कोई भी व्रत शास्त्रीय विधिपूर्वक करना चाहिए। तभी उसका फल मिलता है। सिर्फ सोने की गहनों की पूजा करने से अगर हो जाता तो सभी आज लखपति होते। सच्ची बात यह है कि सोने के गहनों का विधि से पूजन करना चाहिए। व्रत की उद्यापन विधि भी शास्त्रीय विधि मुताबिक करनी चाहिए। तभी यह वैभव लक्ष्मी व्रत फल  है।

यह बरत शुक्रवार को करना चाहिए। सुबह में सन्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनो और सारा दिन मन में “जय मा लक्ष्मी “का रटन करते रहो और किसी की चुगली नहीं करनी चाहिए। शाम को पूर्व दिशा में मूहं रख सके ,इस तरह आसान पर बैठ जाओ।

सामने पाटा रख कर उसके ऊपर रुमाल रखो। रुमाल पर चावल का छोटा सा ढेर करो। उस ढेर पर पानी से भरा तांबे से भरा कलश रख कर ,कलश पर एक कटोरी रखो। उस कटोरी में एक सोने का गहना रखो। यदि सोने का न हो तो  चाँदी  का भी चलेगा,चांदी न हो तो नगद रुपया भी चलेगा।  बाद में दिया जलाकर धूपबत्ती सुलगा कर रखो।

माँ लक्ष्मी का बहुत स्वरूप है। और माँ लक्ष्मी को “श्री यन्त्र “अति प्रिय है। अतः “वैभवलक्ष्मी “में पूजा विधि करते वक्त सौ प्रथम “श्री यंत्र”और लक्ष्मी जी के विविध स्वरूपों को सच्चे दिल से दर्शन करो। उसके बाद “लक्ष्मी स्तवन” का पाठ करो।  बाद में कटोरी में रखे गए सोने के गहने या रूपये को हल्दी कुमकुम और चावल चढ़ा कर पूजा करो और लाल रंग का फूल चढ़ाओ। शाम को कोई मीठी चीज़ बनाकर उसका प्रसाद रखो। ना हो सके तो शक़्कर या गुड़ भी ले सकता है। फिर आरती करके 11 बार सच्चे हृदय से “जय माँ लक्ष्मी “बोलो। बाद में 11 या 21 शुक्रवार यह व्रत करने का ढृढ़ संकल्प माँ के सामने करो और आपकी जो मनोकामना हो वह पूरा करने को माँ लक्ष्मी जी को विनती करो। फिर माँ का प्रसाद बाँट दो। और थोड़ा प्रासाद अपने लिए रखो। अगर आप में शक्ति हो तो सारा दिन उपवास रखो और सिर्फ प्रसाद ग्रहण करते समय खाना खा लो। अगर थोड़ी शक्ति भी न हो तो दो बार भोजन कर सकते हो। बाद में कटोरी में रखा गहना या रुपया ले लो। कलश का पानी तुलसी क्यारे में डाल दो। और चावल पछियों को डाल दो। इसीतरह शास्त्रीय विधि के अनुसार व्रत करने से उसका फल अवस्य मिलता है। इस व्रत के प्रभाव से सब प्रकार की विपत्ति दूर होकर आदमी मालामाल हो जाता है। संतान न हो तो उसे संतान प्राप्ति होती है। सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रहता है।कुमारी लड़की को मनभावन पति मिलता है। शिला यह सुन कर आनंदित हो गयी। फिर पूछा -माँ !आपने “वैभवलक्ष्मी व्रत “की जो शास्त्रीय विधि बताई ,वैसे मै अवश्य करूंगी। लेकिन इसका उद्यापन विधि किस तरह करनी चाहिए ?कृपा करके आप इसे भी सुनाईये।

माँ जी ने कहा -11 या 21 जो मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार यह “वैभवलक्ष्मी व्रत “पूरी श्रद्धा और भावना से करना चाहिए। व्रत के आखिरी शुक्रवार को जो शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिए वह तुझे बताती हूँ। आखिरी शुक्रवार को खीर या नैवेध रखो। पूजन विधि हर शुक्रवार को करते है वैसे ही करना चाहिए। पूजन विधि के बाद श्रीफल फोड़ो  और कम से कम साथ कुंवारी या सौभग्यवती स्त्रियों को कुमकुम का तिलक करके साहित्य संगम की “वैभवलक्ष्मी व्रत “की एक – एक पुस्तक उपहार में देनी चाहिए।और सबको खीर का प्रसाद देनी चाहिए। फिर धन लक्ष्मी स्वरुप ,वैभवलक्ष्मी स्वरुप ,माँ लक्ष्मी जी की छवि को प्रणाम करे। माँ लक्ष्मी जी का यह स्वरुप वैभव देने वाला है। प्रणाम करके मन ही मन भावुकता से माँ की प्रार्थना करते वक्त कहे कि -हे माँ धनलक्ष्मी !हे माँ वैभवलक्ष्मी !मैंने सच्चे ह्रदय से आप को “वैभवलक्ष्मी व्रत” पूर्ण किया है। तो है माँ !हमारी की मनोकामना पूर्ण करो। हमारा सबका कल्याण की जैसे संतान न हो उसे संतान देना। सौभाग्यशाली स्त्री का सौभग्य अखंड रखना। कुवारी लड़की को मनभावन पति देना। आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत जो करे उनकी सब विपत्ति दूर करना। सबको सुखो करना। हे माँ! आपकी महिमा अपरंपार है।

इस तरह माँ की प्रार्थना करके माँ लक्ष्मीजी का “धनलक्ष्मी स्वरूप “को भाव से वंदन करो। माँ जी के पास से “वैभवलक्ष्मी व्रत “की शास्त्रीय विधि सुनकर शीला भावविभोर हो उठी उसे लगा मानो सुख का रास्ता मिल गया है। उसने आँखे बंद करके मन ही मन उसी क्षड़ संकल्प लिया है -हे वैभवलक्ष्मी माँ !मै भी माँ जी के कहे मुताबित श्रद्धा से शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यापन विधि करूंगी।

शिला ने संकल्प करके आँखे खोली तो सामने कोई ना था। वह विस्मित हो गयी की माँ जी कहा है ,माँ जी कहा चली गयी ?यह माँ जी दूसरा कोई न था…….साक्षात लक्ष्मी जी ही थी। शिला लक्ष्मी जी की भक्त भी थी इसलिए अपने भक्त को रास्ता दिखने के लिए माँ लक्ष्मी देवी माँ जी का स्वरुप धारण करके शिला के पास आयी थी। दूसरे दिन शुक्रवार था। सवेरे स्वच्छ कपड़े पहन कर शिला मन ही मन श्रद्धा और पुरे भाव से ,”जय माँ लक्ष्मी -2 का मन ही मन रटन करने लगी। सारा दिन किसी की चुगली  की नहीं। शाम हुयी तब हाथ, पाँव, मुँह ,धोकर शिला पूर्व दिशा में मुँह करके बैठी। घर में पहले सोने के बहुत से गहने थे। लेकिन पतिदेव ने रास्ते पर चल क्र सब गहने गिरवी रख दिए थे। पर नाक की चुन्नी बच गयी थी नाक की चुन्नी निकल कर ,शिला ने उसे धोकर कटोरी में रख दी। सामने पाटे पर रुमाल रख कर मुठ्ठी भर चावल का ढ़ेर किया। उसपर तांबे का कलश पानी भर कर रखा। उसके ऊपर चुन्नी वाली टोकरी राखी। फिर माँ जी  थी कि वह शास्त्रीय विधि अनुसार वंदन ,स्तवन ,पूजन वगैरह किया। और घर में थोड़ी शक्कर थी ,वह प्रसाद में रख कर “वैभवलक्ष्मी  व्रत ” किया।

यह प्रसाद पहले  पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शिला को मारा नहीं ,सुनाया भी नही। शिला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में “वैभवलक्ष्मी व्रत ” के लिए श्रद्धा बढ़ गई। शिला ने पूर्ण श्रद्धा भक्ति से 21 शुक्रवार तक “वैभवलक्ष्मी व्रत “किया। 21वें  शुक्रवार को माँ जी के कहे मुताबित उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को “वैभवलक्ष्मी व्रत “की सात पुस्तक उपहार दी। फिर माता जी के “धनलक्ष्मी स्वरूप “की छवि को बंदन करके भाव से  मन ही मन प्रार्थना करने लगी -हे माँ धनलक्ष्मी !मैंने आप का “वैभवलक्ष्मी व्रत “करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ !मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो ,उसे संतान देना। सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुवांरी लड़कियों को मन भावन पति देना। आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करें। उनकी सब विपत्ति दूर करना। सबको सुखी रखना। हे माँ !आपकी महिमा अपार है। ऐसा बोलकर लक्ष्मी जी के”धनलक्ष्मी स्वरूप “की छवि को प्रणाम किया। इस तरह शास्त्रीय विधिपूर्वक  शिला ने श्रद्धा से व्रत किया और तुरंत ही उसे फल मिला। उसका पति गलत रास्ते पर चला गया था वह अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। माँ लक्ष्मीजी के वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से उसको ज्यादा मुनाफा होने लगा। उसने तुरंत शिला की गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। धन में धन की बाढ़ सी आ गयी। घर में पहले जैसी सुख शांति छा  गयी। वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव देख कर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी शास्त्रीय विधिपूर्वक “वैभवलक्ष्मी व्रत “करने लगी।

हे माँ धनलक्ष्मी !आप जैसे शिला पर प्रसन्न हुयी ,उसी तरह आप का व्रत करने वाले सब भक्तों पर प्रसन्न होना। सबको सुख – शांति देना।जय वैभवलक्ष्मी माँ ,जय धनलक्ष्मी माँ।

आरती महालक्ष्मी (aarti mhalakshmi) जी की

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निस दिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय…

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय…

तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय…

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय…

जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय…

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय…
शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय…

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।
उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय…

 

 

 

 

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