best shayari and ghazal collection of Dr. Rahat Indori in hindi

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सबसे ज्यादा हिट ग़ज़ल : बुलाती है मगर जाने का नईं

1) रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है

2) मैंने अपनी खुश्क आँखों से लहू छलका दिया,
इक समंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।

3) बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

4) नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है

5) रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

6) मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी

7) बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए

8) बोतलें खोल कर तो पी बरसों
आज दिल खोल कर भी पी जाए

9) मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

10) शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

11) सूरज सितारे चाँद मिरे सात में रहे
जब तक तुम्हारे हात मिरे हात में रहे

12) कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिए
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है

13) दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

14) वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा
मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया

15) ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

16) ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो

17) हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

18) एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

19) घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

20) शहर क्या देखें कि हर मंज़र में जाले पड़ गए
ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए

21) अजनबी ख़्वाहिशें , सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे , कि उड़ा भी न सकूँ

22) आँख में पानी रखो , होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो , तरकीबें बहुत सारी रखो

23) रोज़ तारों को नुमाइश में , खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं , अंधेरे में निकल पड़ता हैं

24) आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

25) अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते

26) अब हम मकान में ताला लगाने वाले हैं
पता चला हैं की मेहमान आने वाले हैं

27) राह के पत्थर से बढ के, कुछ नहीं हैं मंजिलें
रास्ते आवाज़ देते हैं, सफ़र जारी रखो

28) जागने की भी, जगाने की भी, आदत हो जाए
काश तुझको किसी शायर से मोहब्बत हो जाए

29) दूर हम कितने दिन से हैं, ये कभी गौर किया
फिर न कहना जो अमानत में खयानत हो जाए

30) सूरज, सितारे, चाँद मेरे साथ में रहें
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहें

31) गुलाब, ख्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या हैं
में आ गया हु बता इंतज़ाम क्या क्या हैं
फ़क़ीर, शाह, कलंदर, इमाम क्या क्या हैं
तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या हैं

32) कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं
कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं
ये केचियाँ हमें उड़ने से खाक रोकेंगी
की हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं

33) हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा हैं
आज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रखा हैं
मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया
मेरे कमरे में भी एक “ताजमहल” रखा हैं

34) जवानिओं में जवानी को धुल करते हैं
जो लोग भूल नहीं करते, भूल करते हैं
अगर अनारकली हैं सबब बगावत का
सलीम हम तेरी शर्ते कबूल करते हैं

35) नए सफ़र का नया इंतज़ाम कह देंगे
हवा को धुप, चरागों को शाम कह देंगे
किसी से हाथ भी छुप कर मिलाइए
वरना इसे भी मौलवी साहब हराम कह देंगे

36) जवान आँखों के जुगनू चमक रहे होंगे
अब अपने गाँव में अमरुद पक रहे होंगे
भुलादे मुझको मगर, मेरी उंगलियों के निशान
तेरे बदन पे अभी तक चमक रहे होंगे

37) इश्क ने गूथें थे जो गजरे नुकीले हो गए
तेरे हाथों में तो ये कंगन भी ढीले हो गए
फूल बेचारे अकेले रह गए है शाख पर
गाँव की सब तितलियों के हाथ पीले हो गए

38) सरहदों पर तनाव हे क्या
ज़रा पता तो करो चुनाव हैं क्या

39) शहरों में तो बारूदो का मौसम हैं
गाँव चलों अमरूदो का मौसम हैं

40) काम सब गेरज़रुरी हैं, जो सब करते हैं
और हम कुछ नहीं करते हैं, गजब करते हैं
आप की नज़रों मैं, सूरज की हैं जितनी अजमत
हम चरागों का भी, उतना ही अदब करते हैं

41) ये सहारा जो न हो तो परेशां हो जाए
मुश्किलें जान ही लेले अगर आसान हो जाए
ये कुछ लोग फरिस्तों से बने फिरते हैं
मेरे हत्थे कभी चढ़ जाये तो इन्सां हो जाए

42) उसकी याद आई हैं सांसों, जरा धीरे चलो
धडकनों से भी इबादत में खलल पड़ता हैं

43) लवे दीयों की हवा में उछालते रहना
गुलो के रंग पे तेजाब डालते रहना
में नूर बन के ज़माने में फ़ैल जाऊँगा
तुम आफताब में कीड़े निकालते रहना

44) जुबा तो खोल, नज़र तो मिला,जवाब तो दे
में कितनी बार लुटा हु, मुझे हिसाब तो दे
तेरे बदन की लिखावट में हैं उतार चढाव
में तुझको कैसे पढूंगा, मुझे किताब तो दे

45) सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे
चले चलो की जहाँ तक ये आसमान रहे
ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे

46) तुफानो से आँख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो
मल्लाहो का चक्कर छोड़ो, तैर कर दरिया पार करो
फूलो की दुकाने खोलो, खुशबु का व्यापर करो
इश्क खता हैं, तो ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो

47) उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर मंतर सब
चाक़ू वाक़ू, छुरियां वुरियां, ख़ंजर वंजर सब
जिस दिन से तुम रूठीं,मुझ से, रूठे रूठे हैं
चादर वादर, तकिया वकिया, बिस्तर विस्तर सब
मुझसे बिछड़ कर, वह भी कहां अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े वपड़े, ज़ेवर वेवर सब

48) यही ईमान लिखते हैं, यही ईमान पढ़ते हैं
हमें कुछ और मत पढवाओ, हम कुरान पढ़ते हैं
यहीं के सारे मंजर हैं, यहीं के सारे मौसम हैं
वो अंधे हैं, जो इन आँखों में पाकिस्तान पढ़ते हैं

49) चलते फिरते हुए मेहताब दिखाएँगे तुम्हे
हमसे मिलना कभी पंजाब दिखाएँगे तुम्हे

50) इस दुनिया ने मेरी वफ़ा का कितना ऊँचा मोल दिया
बातों के तेजाब में, मेरे मन का अमृत घोल दिया
जब भी कोई इनाम मिला हैं, मेरा नाम तक भूल गए
जब भी कोई इलज़ाम लगा हैं, मुझ पर लाकर ढोल दिया

51) कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया
इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया
अफवाह थी की मेरी तबियत ख़राब हैं
लोगो ने पूछ पूछ के बीमार कर दिया

52) मौसमो का ख़याल रखा करो
कुछ लहू मैं उबाल रखा करो
लाख सूरज से दोस्ताना हो
चंद जुगनू भी पाल रखा करो

53) फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए
जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए
भूलना भी हैं, जरुरी याद रखने के लिए
पास रहना है, तो थोडा दूर होना चाहिए

54) अब जो बाज़ार में रखे हो तो हैरत क्या है
जो भी देखेगा वो पूछेगा की कीमत क्या है
एक ही बर्थ पे दो साये सफर करते रहे
मैंने कल रात यह जाना है कि जन्नत क्या है

55) आग के पास कभी मोम को लाकर देखूं
हो इज़ाज़त तो तुझे हाथ लगाकर देखूं
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगाकर देखूं

56) ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे
जो हो परदेश में वो किससे रजाई मांगे

57) राज़ जो कुछ हो इशारों में बता भी देना
हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना

58) हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते

59) जा के कोई कह दे, शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तैयारी से
बादशाहों से भी फेके हुए सिक्के ना लिए
हमने खैरात भी मांगी है तो खुद्दारी से

60) बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा
जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा
चोर उचक्कों की करो कद्र, की मालूम नहीं
कौन, कब, कौन सी सरकार में आ जाएगा

61) नयी हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती हैं
कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती हैं
जो जुर्म करते है इतने बुरे नहीं होते
सज़ा न देके अदालत बिगाड़ देती हैं

62) लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मोड़ होता हैं जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यही आके फिसलते क्यों हैं

63) साँसों की सीडियों से उतर आई जिंदगी
बुझते हुए दिए की तरह, जल रहे हैं हम
उम्रों की धुप, जिस्म का दरिया सुखा गयी
हैं हम भी आफताब, मगर ढल रहे हैं हम

64) इश्क में पीट के आने के लिए काफी हूँ
मैं निहत्था ही ज़माने के लिए काफी हूँ
हर हकीकत को मेरी, खाक समझने वाले
मैं तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ
एक अख़बार हूँ, औकात ही क्या मेरी
मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ

65) दिलों में आग, लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चहेरों पर, दोहरी नकाब रखते हैं
हमें चराग समझ कर भुझा ना पाओगे
हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं

66)मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे
मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

67) न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

68) मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग
गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गए

69) मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे

70) उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

71) ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर
जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे

72) मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे

73) अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया
ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ

74) राज़ जो कुछ हो इशारों में बता देना
हाथ जब उससे मिलाओ दबा भी देना
नशा वेसे तो बुरी शे है, मगर
“राहत” से सुननी हो तो थोड़ी सी पिला भी देना

75) इन्तेज़ामात नए सिरे से संभाले जाएँ
जितने कमजर्फ हैं महफ़िल से निकाले जाएँ
मेरा घर आग की लपटों में छुपा हैं लेकिन
जब मज़ा हैं, तेरे आँगन में उजाला जाएँ

76) ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था
में बच भी जाता तो मरने वाला था
मेरा नसीब मेरे हाथ कट गए
वरना में तेरी मांग में सिन्दूर भरने वाला था

77) इस से पहले की हवा शोर मचाने लग जाए
मेरे “अल्लाह” मेरी ख़ाक ठिकाने लग जाए
घेरे रहते हैं खाली ख्वाब मेरी आँखों को
काश कुछ देर मुझे नींद भी आने लग जाए
साल भर ईद का रास्ता नहीं देखा जाता
वो गले मुझ से किसी और बहाने लग जाए

78) दोस्ती जब किसी से की जाये
दुश्मनों की भी राय ली जाए
बोतलें खोल के तो पि बरसों
आज दिल खोल के पि जाए

79) बुलाती है मगर जाने का नईं
वो दुनिया है उधर जाने का नईं

ज़मीं रखना पड़े सर पर तो रक्खो
चलो हो तो ठहर जाने का नईं

है दुनिया छोड़ना मंज़ूर लेकिन
वतन को छोड़ कर जाने का नईं

जनाज़े ही जनाज़े हैं सड़क पर
अभी माहौल मर जाने का नईं

सितारे नोच कर ले जाऊँगा
मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नईं

मिरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नईं

वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर ज़ालिम से डर जाने का नईं

सड़क पर अर्थियाँ ही अर्थियाँ हैं
अभी माहौल मर जाने का नईं

वबा फैली हुई है हर तरफ़
अभी माहौल मर जाने का नईं

जानिए कितना प्यार करती है आपकी पत्नी, रखे ये ध्यान

यदि आप यह सचमुच में जानने को बेताब हैं कि आपकी पत्नी आपको प्यार करती है या नहीं, तो बस यह गौर कीजिए कि वह कितनी बार आपको गले लगाती हैं या आपका चुंबन लेती है। ‘डेली मेल’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में एक नए सर्वेक्षण के हवाले से बताया गया है कि महिलाएं अगर अपने पति से प्यार करती हैं, तो उन्हें गले लगाती है और चुंबन लेती हैं और नखरे भी कम दिखाती हैं।

अध्ययन में पाया गया कि पुरुष स्वभाव से रोमांटिक नहीं होते हैं और वे घर के कामकाज में योगदान देकर अपना प्यार जाहिर करते हैं। इस सर्वेक्षण में 168 दंपतियों को शामिल किया गया। पुरुषों ने विभिन्न तरीकों से अपनी भावनाएं महिलाओं को जाहिर की।

एक ओर जहां महिलाओं ने नकारात्मक विचार और भावनाएं छिपाकर प्यार प्रदर्शित किया, वहीं दूसरी ओर पुरुषों ने कपड़े धोने जैसे घर के कामकाज में हाथ बंटाकर या कामुक क्रियाओं की शुरुआत करके अपना प्यार जाहिर किया। वैसे पति जो अपनी पत्नी से अधिक प्यार करते हैं, उनके सहवास करने की अधिक संभावना होती है। इस बारे में अध्ययनकर्ताओं ने बताया कि यह इस विचार का समर्थन करता है कि पुरुषों द्वारा अपने प्यार को प्रकट करने का यह एक अहम माध्यम है।

अमित शाह को क्यों सता रहा है हारने का डर – रविश कुमार की कलम से

सब कुछ आपकी आंखों के सामने मैनेज होता दिख रहा है. संस्थाएं ग़ुलाम हो चुकी हैं. मीडिया बक़ायदा गोदी मीडिया हो चुका है. फिर भी अमित शाह को क्यों डर लगता है

रिटायर जस्टिस ए के पटनायक का बयान आया है कि उन्हें वर्मा के ख़िलाफ़ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के कोई प्रमाण नहीं मिले थे. सुप्रीम कोर्ट ने ही जस्टिस पटनायक से कहा था कि वे सीवीसी की रिपोर्ट की जांच करें. पटनायक ने चौदह दिनों के भीतर जांच कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी थी. उन्होंने वर्मा को भी अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया. यह भी कहा कि सीवीसी ने स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के साइन किए हुए बयान तो भेजे लेकिन अस्थाना ने उनके सामने ऐसा बयान नहीं दिया. इंडियन एक्सप्रेस में जस्टिस पटनायक का बयान छपा है. उन्होंने सीमा चिश्ति से बातचीत में ये सब कहा है. उनका कहना है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट अंतिम शब्द नहीं है. जस्टिस पटनायक का बयान है कि मैंने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट में लगाए गए किसी आरोप में भ्रष्टाचार के प्रमाण नहीं मिले हैं.

तो इस मामले में क्या हुआ? सीवीसी ने वर्मा के ख़िलाफ़ आरोपों की सूची बनाई. सरकार ने वर्मा को हटा दिया. वर्मा सुप्रीम कोर्ट जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट कहता है कि वर्मा के ख़िलाफ़ सीवीसी ने जो सामग्री पेश की है वह पद से हटाने के लिए अपर्याप्त है. वर्मा बहाल कर दिए जाते हैं. अब प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बनी कमेटी उन्हीं अप्रमाणित आरोपों के आधार पर वर्मा को हटा देती है.

सरकार समर्थक भक्त सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं कि जस्टिस सीकरी ने भी सीवीसी को रिपोर्ट को सही माना. संदेह की सुई प्रधानमंत्री की तरफ थी कि वे रफाल मामले में जांच रोकने के लिए वर्मा को हटाना चाहते हैं. वर्मा को हटाने की पहली कोशिश सुप्रीम कोर्ट में सफल नहीं हुई थी. लिहाज़ा प्रधानमंत्री को बचाने के लिए भक्तगण जस्टिस सीकरी के वोट का सहारा ले रहे हैं. उधर स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे थे कि उनके ख़िलाफ़ वर्मा ने जो एफआईआर दर्ज कराई थी, उसे निरस्त किया जाए. दिल्ली हाई कोर्ट ने उल्टा सीबीआई को दस हफ़्तों के भीतर जांच पूरी करने का आदेश दे दिया है.

अब आप एक और चीज़ पर ग़ौर करें. सब कुछ आपकी आंखों के सामने मैनेज होता दिख रहा है. संस्थाएं ग़ुलाम हो चुकी हैं. मीडिया बक़ायदा गोदी मीडिया हो चुका है. फिर भी अमित शाह को क्यों डर लगता है कि 2019 में हार गए तो ग़ुलाम हो जाएंगे? क्या वे भाजपा के कार्यकर्ताओं को डरा रहे हैं? जीत के प्रति जोश भरने का यह कौन सा तरीक़ा हुआ कि हार जाएंगे तो ग़ुलाम हो जाएंगे? इसके पहले भी बीजेपी हारी है, क्या उसके कार्यकर्ता ग़ुलाम हो गए थे? राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में क्या ग़ुलाम हो गए हैं?

अमित शाह को किसकी ग़ुलामी का डर सता रहा है? कहीं वे अपने गुनाहों के इतने ग़ुलाम तो नहीं हो चुके हैं कि हार से डर लगने लगा है? क्या अमित शाह को भी भारत की महान सेना और संस्थाओं पर भरोसा नहीं है? फिर वे क्यों कहते हैं कि 2019 में हार गए तो दो सौ साल की ग़ुलामी आ जाएगी? दिल्ली में अमित शाह ने कहा है कि 2019 की लड़ाई पानीपत की तीसरी लड़ाई है. मराठों के हारने के बाद दो सौ साल की ग़ुलामी आई थी. अमित शाह अपने राजनीति प्रतिद्वंद्वी को कभी सांप छुछूंदर कुत्ता बिल्ली बोलते हैं तो कभी अहमद शाह अब्दाली बताने लगते हैं. क्या बीजेपी अपने विरोधियों को अहमद शाह अब्दाली मानती है? ऐसा मानने के क्या आधार हैं उसके पास? क्या अमित शाह के पास सांप्रदायिकता के खांचे में फ़िट होने वाले ऐसे ही रूपक और नारे बच गए हैं?

भाजपा के कार्यकर्ताओं को सोचना चाहिए. कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके समर्पण को अमित शाह ने ग़ुलामी में बदल दिया है. अमित शाह खाई में कूदने को कहेंगे तो खाई में कूद जाएंगे. पांच साल के बाद क्या कोई भी काम नहीं हुआ जिसे लेकर जनता के बीच जा सकें? क्या जनता के बीच जाने के लिए ग़ुलामी और पानीपत की तीसरी लड़ाई जैसे रूपक ही बचे हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह आलोक वर्मा के मामले में स्पष्ट फ़ैसला नहीं दिया, अपने ही आदेश से बनी पटनायक रिपोर्ट पर विचार नहीं किया, आलोक वर्मा को हटाया गया, उसके पहले जय शाह की ख़बर दबाई गई, जज लोया की ख़बरों पर पर्दा डाला गया, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सब बरी होते गए. आज़म ख़ान गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या के हत्यारों के बारे में बयान देता है, सब चुप हो जाते हैं. रफाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस सीएजी रिपोर्ट का ज़िक्र कर दिया जिसे संसद की स्थाई समिति में पेश ही नहीं किया गया. न सुप्रीम कोर्ट फिर कुछ कहता है और न सरकार. सीबीआई और चुनाव आयोग का इस्तमाल कर दो साल तक आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों के ख़िलाफ़ केस चलाया गया, मीडिया में इस डर को बड़ा किया गया कि अब आप की सरकार गिर जाएगी. क्या आपको पता है कि वे सारे केस कहां हैं?0

गुनाहों की ये सूची और भी लंबी हो सकती है. मगर अमित शाह को हार जाने पर ग़ुलामी का डर क्यों सता रहा है? शाह और मोदी तो शहंशाह हैं. उन्हें अब जीतने के लिए कार्यकर्ताओं को क्यों डराना पड़ रहा है? देखो लग जाओ, जान लगा दो वर्ना हार गए तो हम ग़ुलाम हो जाएंगे. कार्यकर्ता ने ऐसा क्या किया है कि उसे हारने पर ग़ुलामी का डर होना चाहिए? क्या नेताओं ने कुछ ऐसा किया है….